शिमला/हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश में पंचायत व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण मोड सामने आ गया है प्रदेश की मौजूद पंचायत का कार्यकाल 31 जनवरी 2026 को समाप्त हो रहा है जिसके चलते ही 1 फरवरी से पंचायत प्रधान व उप प्रधान और वार्ड सदस्यों की वैधानिक शक्तियां समाप्त हो जाएगी इस स्थिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासनिक और विकास कार्य को लेकर भी चिंता को बढ़ा दिया गया है इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के निर्देश है जिनमें अदालत में यह स्पष्ट किया है कि पंचायत चुनाव हर हाल में 30 अप्रैल से पहले पूरे किए जाएं और हाई कोर्ट के आदेशों के बाद प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमले में हलचल तेज हो गई है।
हाई कोर्ट का सख्त रुख
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने पंचायत चुनाव को लेकर यह स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पंचायत चुनाव में अनावश्यक देरी नहीं की जानी चाहिए अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि चुनाव पप्रक्रिया को समयबध तरीके से पूरी हो जानी चाहिए कोर्ट के निर्देशों के बाद राज्यों निर्वाचन विभाग, ग्रामीण विकास क्षेत्र और पंचायती पंचायती राज विभाग और जिला प्रशासन चुनाव की तैयारी को लेकर मंथन में जुट गए हैं।
31 जनवरी को खत्म हो रहा पंचायत का कार्यकाल
हिमाचल प्रदेश की 3577 पंचायतों का कार्यकाल अब 31 जनवरी को पूरा हो रहा है और इसके बाद वर्तमान पंचायत प्रतिनिधि का आधिकारिक कार्यकाल समाप्त माना जाएगा ऐसे में पंचायत द्वारा नई योजनाओं की स्वीकृति विकास कार्य की मंजूरी प्रशासनिक निर्णय जैसे कार्य पर सीधा असर पड़ सकता है ग्रामीण क्षेत्रों में आशंका जताई जा रही है कि यदि विकल्पित व्यवस्था समय पर लागू नहीं की गई तो विकास कार्यों की गति धीमी पड़ सकती है।
पंचायती राज अधिनियम में मौजूद कानूनी प्रावधान
हालांकि, इस स्थिति से निपटने के लिए हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम 1994 में कानून प्रावधान मौजूद है इसके अधिनियम की धारा 140 (3) के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि यदि पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते हैं तो पंचायत का संचालन वैकल्पित व्यवस्था के माध्यम से किया जा सकता है इस प्रावधान के तहत सरकार के पास दो प्रमुख विकल्प उपलब्ध है।
सरकार के सामने दो विकल्प:
(1) तीन सदस्य समिति का गठन:- सरकार पंचायत संचालन के लिए एक तीन सदस्य समिति का गठन कर सकती है जो पंचायत के प्रशासनिक और विकास कार्यों को देखेगी।
(2) प्रशासनिक अधिकारी को सौंपा जा सकता है जिम्मा:- दूसरा विकल्प यह है कि पंचायत स्तर पर सचिव या अन्य प्रशासनिक अधिकारी को आवश्यक अधिकार देकर पंचायत का संचालन कराया जाए।
इन दोनों विकल्पों का उद्देश्य यही है कि पंचायत स्तर पर मनरेगा, भुगतान निर्माण कार्यों और विकास योजना में कोई रुकावट न आए।
पंचायती राज विभाग का बयान
ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के निर्देशक राघव शर्मा ने इस मामले पर स्थिति को स्पष्ट करते हुए यह बताया कि हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार पंचायत चुनाव कराने की प्रक्रिया जारी कर दी जाएगी और संबंधित फाइलें सरकार को भेजी जा चुकी है और जल्दी इस पर निर्णय भी लिया जाएगा ताकि पंचायत का कार्य प्रभावित न हो सके उन्होंने कहा है कि विभागीय सुनिश्चित करने का प्रयास भी कर रहा है कि चुनाव होने तक पंचायत में प्रशासनिक काम का सुचारू रूप से आगे चला रहे।
विकास कार्यों पर मंडरा रहा असर
पंचायत प्रतिनिधि का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ग्रामीण इलाकों में चिंता का माहौल बना हुआ है खासकर:
• मनरेगा मजदूरी का भुगतान
• सड़क पानी और भवन निर्माण कार्य
• स्वीकृत योजनाओं की क्रियान्वन प्रक्रिया
इन सभी पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत प्रतिनिधियों की गैर मौजूदगी में स्थानीय समस्याओं के समाधान में देरी हो सकती है।
चुनाव प्रक्रिया को लेकर तैयारियां तेज
राज्य निर्वाचन आयोग और जिला प्रशासन हाई कोर्ट के आदेशों को देखते हुए पंचायत चुनाव की रूपरेखा तैयार करने में अभी जुट गई है मतदाता सूचियां का अध्ययन आरक्षण प्रक्रिया और चुनाव कार्यक्रम को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया अभी तेज कर दी गई है प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार सरकार की कोशिश है कि चुनाव प्रक्रिया को जल्द से जल्द कर 30 अप्रैल से पहले संपन्न कर दिया जाएगा।
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ग्रामीण क्षेत्र की उम्मीदें ग्रामीण इलाकों के लोग चाहते हैं कि:
• पंचायत चुनाव समय पर हो
• विकास कार्य बाधित न हो
• विकल्पित व्यवस्था पारदर्शी और प्रभावी हो
कई सामाजिक संगठनों ने भी सरकार से मांग की है कि पंचायत व्यवस्था को कमजोर न होने दिया जाए।
राजनीतिक और प्रशासनिक नजरिया राजनीतिक विशेष्यको का मानना है कि पंचायत चुनाव लोकतंत्र की नीव होते हैं और इनमें देरी से ही स्थानीय स्तर पर असंतोष बढ़ भी सकता है वहीं प्रशासन का कहना है कि हाईकोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह से पालन भी किया जाएगा।
हिमाचल प्रदेश मैं पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती भी खड़ी हो गई है और हाई कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद सरकार के लिए यह जरूरी हो गया है कि पंचायत चुनाव समय सीमा में कराए जाए और तब तक विकल्प व्यवस्था के जरिए ग्रामीण विकास कार्य को सुचारु रखा जाए अब सबकी नज़रें सरकार के अगले फैसले और पंचायत चुनावों की अधिसूचना पर ही टिकी हुई है
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